अपनी पंहचान के लिए एकजुट हुई महिला किसानों ने कहा कि मुझे नहीं हमारे अधिकारों को सुरक्षित करो ||

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वाराणसी से सन्तोष कुमार सिंह की रिपोर्ट

वाराणसी :- प्रगति पथ फ़ाउंडेशन ने इब्तिदा नेटवर्क के सहयोग से बड़ागाँव, वाराणसी में महिला हिंसा और महिला अधिकार 16 दिवसीय अभियान के अंतर्गत “महिला किसान का संघर्ष” विषयक संगोष्ठी का आयोजन किया। कार्यक्रम का उद्देश्य महिला किसानों को स्वयं की पहचान को रेखांकित करना था। अतिथि के रूप में महिला किसान श्रीमती प्रमिला देवी, श्रीमती मीरा देवी, श्रीमती सुनीता देवी रहीं, कार्यक्रम की अध्यक्षता प्रगति पथ फ़ाउंडेशन की महासचिव श्रीमती नीलम पटेल ने किया। कार्यक्रम में विकासखण्ड बड़ागाँव के विभिन्न ग्राम पंचायतों से महिला किसानों ने प्रतिभागन किया।

संगोष्ठी में महिला किसानों ने कहा कि हमारा देश एक कृषि प्रधान देश है जहां की अधिकांशतः लोग खेती-बाड़ी से अपनी रोजी रोटी चला रहे हैं। आज के समय में आधे से ज्यादा खेती के काम को महिलाएं कर रही हैं, लेकिन जब किसान की बात होती है तो हमारे मन में पगड़ी बांधे रौबदार मुछ वाले पुरुष की तशवीर आती है। महिलाओं को किसान का दर्जा नहीं दिया जाता, वे बस मजदूर भर हैं। देश में आज भी महिला किसानों के नाम खेती की जमीन नहीं है। महिला किसान के साथ हो रहे इस भेदभाव का कारण है समाज की पुरुषवादी मानसिकता। सभी व्यवसाय में महिला और पुरुषों के लिए उनके व्यवसाय से संबन्धित स्त्रीलिंग व फुलिंग शब्द हैं, लेकिन हास्यपाद है कि किसान शब्द का स्त्रीलिंग शब्द ही नहीं बना है। वक्ताओं ने आगे कहा कि जब खेती में आधे से ज्यादा भागीदारी महिलाओं की है तो महिला किसान को भी उनकी पहचान मिलनी चाहिए, उन्हें भी किसान का दर्जा मिलना चाहिए।

प्रगति पथ फ़ाउंडेशन की महासचिव नीलम पटेल ने कहा कि महिला जो समाज का एक अहम हिस्सा है, यदि पुरुष ताना है तो महिला बाना है, इन दोनों के बिना ये संसार अधूरा है। दोनों की अपनी अपनी भूमिका है समाज मे परिवर्तन लाने की , दोनों ही मनोबल से सक्षम है। तो फिर दोनों में भेदभाव क्यों है, एक कुशल गृहणी जब बदलाव लाने की बात करती है या अपने अधिकारों की बात करती है तो उस पर हजारों सवाल लाद दिए जाते है, उसके पैरों में तुम्हारी सुरक्षा का हवाला देकर उसे आगे नही बढ़ने दिया जाता है। कथाकथित हमारा समाज महिला और पुरुष को बराबरी का दर्जा देने का दावा करता है, पहनावा और भोजन देने से मात्र बराबरी नही होती है। एक महिला, एक बेटी ,एक माँ और एक बहु जब अपनी किस्मत बदलने की ओर पहला कदम रखती है तो उन्हें यह कह के रोक दिया जाता है कि रुको रुको तुम वहाँ अकेले कैसे जाओगी, क्या करोगी, नही कर पाओगी, हम लोगो को तुम्हारी चिंता है तुम्हारी सुरक्षा करना हमारा फर्ज है और यही सब कहकर महिला को रोक दिया जाता है। मुझे नही, मेरे अधिकारों को सुरक्षित करो। पैरों में बेड़िया नही हाथो में हिम्मत देकर भेजो।

अभियान की संयोजिका श्रीमती सीता देवी ने बताया कि प्रगति पथ फ़ाउंडेशन ग्रामीण महिलाओं के सामाजिक और आर्थिक विकास के लिए निरंतर कार्य कर रही है। महिलाओं को उनका अधिकार भीख में नहीं चाहिए बल्कि उनके अधिकारों की सुरक्षा होनी चाहिए। इसी मुद्दे को लेकर संस्था 16 दिवसीय अभियान “ मुझे नहीं मेरे अधिकारों की सुरक्षा करों नजरिया बदलो और हिंसा को पहचानो, 2021” चला रही है, जो विकासखण्ड बड़ागाँव के 10 ग्राम पंचायतों में चलाया जा रहा है।

 

संगोष्ठी का संचालन सीता देवी और धन्यवाद ज्ञापन दीपक पुजारी ने किया। संगोष्ठी में संगीता सिंह, रेनू वर्मा, शिल्पा, सरोजा, बेबी, वंदना गौरव व सोनी ने अपने विचार रखे।

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