“कफ़न उठाती वर्दी” — जब यूपी पुलिस बनती है बेसहारा इंसानों की आख़िरी उम्मीद

“कफ़न उठाती वर्दी” — जब यूपी पुलिस बनती है बेसहारा इंसानों की आख़िरी उम्मीद
रिपोर्ट-जय सिंह
उत्तर प्रदेश।
अक्सर अख़बारों और टीवी चैनलों पर पुलिस की ख़बरें होती हैं — एनकाउंटर, धरपकड़, यातायात चालान, या फिर विरोध प्रदर्शन में मोर्चा।
लेकिन यूपी पुलिस की एक ऐसी भूमिका भी है, जो बिना सुर्खियों के निभाई जाती है — “कफ़न दान” और “सम्मानजनक अंतिम संस्कार” की भूमिका।
जब किसी का कोई नहीं होता, तब यूपी पुलिस होती है।
जब परिवार छोड़ देता है, तब वर्दी कंधा देती है।
हर जिले में एक ख़ामोश सेवा — कफ़न, लकड़ी और विदाई
उत्तर प्रदेश के 75 ज़िलों में हर हफ्ते कहीं न कहीं कोई लावारिस शव मिलता है — रेलवे स्टेशनों, बस अड्डों, नालों, अस्पतालों, हाईवे किनारे या किसी पेड़ की छांव में।
इन मृतकों में कोई भूखा प्रवासी मज़दूर होता है, कोई मानसिक रूप से अस्वस्थ, कोई बुज़ुर्ग जिसे उसके बच्चों ने छोड़ दिया।
इनके पास न पहचान होती है, न पैसा — और न कोई जो इन्हें श्मशान तक ले जाए।
लेकिन ऐसे वक्त पर वर्दीधारी आगे आते हैं —
यूपी पुलिस।
सिर्फ FIR नहीं दर्ज होती,
कफ़न भी लिया जाता है।
सिर्फ जांच नहीं होती,
संस्कार भी किया जाता है।
एक मौन व्यवस्था – ‘संवेदना फंड’
उत्तर प्रदेश पुलिस के कई जिलों में अब एक अनौपचारिक लेकिन मजबूत परंपरा बन चुकी है — “संवेदना फंड”।
- हर महीने पुलिसकर्मी अपनी सैलरी से 50-100 रुपये जमा करते हैं।
- उस पैसे से कफ़न, अगरबत्ती, लकड़ी, गंगाजल, फूलों की माला और श्मशान शुल्क की व्यवस्था की जाती है।
- पुलिसकर्मी खुद शव को नहलाते हैं, सिर पर कंधा देते हैं और पूरी गरिमा से अंतिम संस्कार करते हैं।
बिना किसी प्रचार के, बिना किसी तालियों के
यह न कोई सरकारी योजना है, न कोई मीडिया कैंपेन।
यह सिर्फ़ इंसानियत है — वर्दी के भीतर धड़कता हुआ दिल।
“वर्दी पहनने का मतलब सिर्फ कानून लागू करना नहीं, बल्कि उस वक़्त इंसान बन जाना है, जब बाकी सब मुँह फेर लें।”
– एक दरोगा, नाम न छापने की शर्त पर।
हर जिले की एक नई मिसाल
- कानपुर में, एक 80 वर्षीय लावारिस वृद्धा की चिता को आग एक महिला सब-इंस्पेक्टर ने दी — “मैं बेटी बनकर आई हूँ”, उसने कहा।
- गोरखपुर में, दो सिपाहियों ने भूख से मरे अजनबी शव को अपने कंधे पर उठाकर घाट तक पहुँचाया।
- प्रयागराज में, पुलिस ने एक अज्ञात मृतक की तेरहवीं भी करवाई, ताकि आत्मा को शांति मिले।
- मेरठ, आगरा, बनारस, अयोध्या, लखनऊ, हर जिले में ये कहानियाँ रोज़ जन्म लेती हैं — बस उनका कोई नाम नहीं होता।
अंतिम संस्कार का आखिरी कंधा — “UP Police”
सामाजिक विडंबना यह है कि अक्सर जिन लोगों से समाज मुंह मोड़ लेता है, वही लोग मरने के बाद “सरकारी ज़िम्मेदारी” बन जाते हैं।
लेकिन यूपी पुलिस उसे सरकारी काम नहीं, “इंसानियत का धर्म” मानती है।
“जब हम शव को कंधा देते हैं, तब वर्दी नहीं, मनुष्य बोलता है। हम बस ये सोचते हैं कि कोई तो हो जो इसे सम्मान से विदा करे।”
– एक हेड कांस्टेबल, वाराणसी।
निष्कर्ष: जब वर्दी रक्षक ही नहीं, रथ का सारथी बन जाए
उत्तर प्रदेश पुलिस को लेकर धारणा जो भी हो, लेकिन यह एक सच्चाई है जिसे नज़रअंदाज़ नहीं किया जा सकता —
कि जब कोई नहीं बचता, तब भी एक वर्दी बचती है।
जो न शोर मचाती है, न फोटो खिंचवाती है,
बस चुपचाप कहती है:
“अब हम हैं, आप अकेले नहीं हैं।