राजस्थान हाईकोर्ट का ज़ोरदार फरमान — पंचायत व निकाय चुनाव 15 अप्रैल 2026 तक हों
जयपुर: राजस्थान हाईकोर्ट ने राज्य सरकार को दिशा-निर्देश जारी करते हुए कहा है कि पंचायत (ग्रामीण निकाय) और नगर निगम नगर पंचायत सहित सभी स्थानीय निकायों के चुनाव 15 अप्रैल 2026 तक पूरी तरह सम्पन्न कर दिए जाएँ। साथ ही, कोर्ट ने यह भी आदेश दिया है कि 31 दिसंबर 2025 तक सभी निकायों का परिसीमन (डिलिमिटेशन) पूरा किया जाए।
आदेश क्यों आया?
यह आदेश उन याचिकाओं पर दिया गया है जिन्हें पूर्व विधायक संयम लोढ़ा, गिरिराज सिंह देवंदा और अन्य ने दायर किया था। याचिकाकर्ताओं का तर्क था कि सरकार ने निम्नलिखित संवैधानिक और कानूनी प्रावधानों का उल्लंघन किया है:
- पंचायती राज की संवैधानु अनुच्छेद 243E: स्थानीय स्वयं-शासन संस्थाओं (पंचायतों) को पाँच वर्ष की अवधि के बाद चुनाव कराने का प्रावधान।
- नगर निकायों के लिए अनुच्छेद 243K: नगर निकायों (म्युनिसिपलिटी) में चुनावों की समयबद्धता सुनिश्चित करना।
- राजस्थान पंचायती राज अधिनियम, 1994 की धारा 17: पंचायती राज संस्थाओं की कार्यकाल समाप्ति के बाद चुनाव आयोजित करने की बाध्यता।
याचिकाकर्ताओं ने यह भी आरोप लगाया था कि चुनाव स्थगित करने की जगह सरकार ने “प्रशासकों” (administrators) की नियुक्ति की है — जबकि उन्हें लोकतांत्रिक रूप से निर्वाचित प्रतिनिधियों द्वारा प्रतिस्थापित किया जाना चाहिए।
कोर्ट का तर्क
- हाईकोर्ट ने माना है कि चुनावों को अनिश्चितकाल तक टालना लोकतांत्रिक सिद्धांतों और संविधान के मूल ढाँचे के विपरीत है।
- कोर्ट ने यह निर्देश दिया कि पंचायत और नगर निकाय चुनाव “एक साथ” (simultaneously) आयोजित किए जाएँ, जिससे संसाधनों की बचत हो और चुनाव प्रक्रिया में व्यवस्थिति बनी रहे।
- कोर्ट ने “परिसीमन (डिलिमिटेशन)” से जुड़ी याचिकाओं को खारिज किया है, और यह स्पष्ट किया है कि परिसीमन को दोबारा चुनौती नहीं दिया जा सकता।
सरकार और चुनाव आयोग पर दबाव
- हाईकोर्ट ने राज्य सरकार को कड़ा समय-सीमा दी है ताकि वह परिसीमन की प्रक्रिया को 31 दिसंबर 2025 तक पूरा करे। यह स्टेप बहुत जरूरी है क्योंकि बिना परिसीमन चुनाव क्षेत्रों (वार्ड, पंचायत, मतदान क्षेत्र) का पुनर्गठन अधूरा रहेगा।
- आदेश में यह भी कहा गया है कि कुल 11,000 से अधिक ग्राम पंचायतें और 309 शहरी स्थानीय निकाय (ULBs) समयबद्धता के साथ चुनाव प्रक्रिया में शामिल हों।
- कोर्ट ने यह स्पष्ट किया है कि प्रशासकों की नियुक्ति लोकतांत्रिक प्रतिनिधित्व का विकल्प नहीं हो सकती जब चुनाव करवाने की अवधि पार हो चुकी हो।
संवैधानिक और लोकतांत्रिक महत्व
- यह फैसला स्थानीय लोकतंत्र की रीढ़ माने जाने वाले पंचायत और निकाय संस्थानों को मजबूत करने की दिशा में एक बड़ा कदम है।
- कोर्ट का यह निर्देश सिर्फ चुनाव कराने तक सीमित नहीं है, बल्कि यह निर्वाचन क्षेत्रों के पुनर्संरचना (डिलिमिटेशन) को भी संवैधानिक रूप से सुनिश्चित करता है — जो यह दिखाता है कि न्यायालय लोकतंत्र की “स्वस्थता” को लेकर गंभीर है।
- यह आदेश “लोकतंत्र का संरक्षण” और “घटक तत्वों (grassroots) पर जनता की भागीदारी” सुनिश्चित करने का प्रयास है।
चुनौतियाँ और आगे की राह
- समय कम है: सरकार के पास परिसीमन पूरा करने और चुनाव कराने के लिए महज कुछ महीने हैं, जो लॉजिक, प्रशासनिक और लॉजिस्टिक चुनौतियों को जन्म दे सकता है।
- आरक्षण, मतदाता सूची, नामांकन प्रक्रिया और निर्वाचन आयोग (State Election Commission) की तैयारियों को तेज़ी से आगे बढ़ाना होगा।
- कुछ राजनीतिक दलों और याचिकाकर्ताओं के बीच यह बहस चल सकती है कि चुनाव “एक राज्य — एक चुनाव” मॉडल के हिस्से के रूप में आयोजित किए जा रहे हैं, या यह सिर्फ कोर्ट द्वारा दिया गया दबाव है।
- प्रशासकों द्वारा पिछले समय में किए गए व्यवस्थापकीय फैसलों की वैधता और उनके अधिकारों पर भी आगे कानूनी बहस हो सकती है।
निष्कर्ष
राजस्थान हाईकोर्ट का यह आदेश न सिर्फ एक कानूनी फैसला है, बल्कि यह स्थानीय शासन में लोकतांत्रिक पुनरुत्थान का संकेत भी है। 15 अप्रैल 2026 की समयसीमा सरकार और निर्वाचन आयोग के लिए चुनौतीपूर्ण होगी, लेकिन अगर यह पूरा हो जाता है, तो यह राज्य में पंचायती राज और स्थानीय निकायों को जीवंत लोकतांत्रिक संरचना में लौटाने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम होगा।


