विशेष रिपोर्ट: सई नदी में भैंसों की मौत नहीं, व्यवस्था की डूबती सांसें

Oplus_16908288
विशेष रिपोर्ट: सई नदी में भैंसों की मौत नहीं, व्यवस्था की डूबती सांसें
✍️ रिपोर्ट: मनोज कुमार सिंह | Hind24tv वेब पोर्टल | जलालपुर, जौनपुर
■ “भैया, सब डूब गईं… कुछ नहीं बचा!”
ये शब्द थे एक टूटे हुए किसान कृपाशंकर यादव के, जब उन्होंने अपनी आंखों के सामने अपने पशुधन को जलकुंभियों में फंसकर दम तोड़ते देखा।
शनिवार की शाम जौनपुर के जलालपुर क्षेत्र में सई नदी के शाहीपुल के पास घटित यह हादसा केवल एक पशुपालक के लिए निजी त्रासदी नहीं है, यह एक प्रशासनिक ढांचे, पर्यावरणीय उपेक्षा और ग्रामीण संकट-प्रबंधन की विफलता की गूंज है — जो अभी तक किसी अफसर की नींद नहीं तोड़ सकी है।
घटना का विवरण: कैसे डूबीं 11 भैंसें?
कृपाशंकर यादव, जो पूर्व जिला पंचायत सदस्य भी रह चुके हैं, हर दिन की तरह अपनी 15 भैंसों को सई नदी के किनारे नहलाने और चराने लाए थे। सब कुछ सामान्य था, लेकिन यह शाम भयानक बन गई।
भैंसें जैसे ही पानी में घुसीं, वे जलकुंभियों की घनी परतों में फंसने लगीं। बहाव तेज था और काई जैसी मोटी जड़ीदार जलकुंभी उनके शरीर को जकड़ चुकी थी। देखते ही देखते एक-एक कर 11 भैंसें नदी में समा गईं।
कुछ भैंसों के शव अभी भी नहीं मिल सके हैं। अनुमान है कि सभी की मौत हो चुकी है।
प्रशासन: सूचना देने के बावजूद ‘अनुपस्थित’
हादसे के तुरंत बाद कृपाशंकर ने डायल-112 और उपजिलाधिकारी, केराकत को फोन कर मदद की गुहार लगाई। लेकिन न तो कोई अफसर घटनास्थल पर पहुंचा, और न ही कोई राहत-बचाव टीम।
प्रश्न: जब स्थानीय स्तर पर पशुधन से जुड़ा इतना बड़ा नुकसान होता है, तो आपात व्यवस्था क्यों निष्क्रिय हो जाती है?
गांववालों की मदद से शव निकालने की कोशिशें हुईं, लेकिन जलकुंभी की मोटी परत और तेज बहाव के कारण कोई सफलता नहीं मिली।
जाम और भीड़: प्रशासन की अनुपस्थिति से फैली अव्यवस्था
हादसे की खबर आग की तरह फैली और शाहीपुल पर भारी भीड़ जमा हो गई। देखते ही देखते दोनों ओर वाहनों की लंबी कतार लग गई। यातायात पूर्ण रूप से ठप हो गया।
बाद में स्थानीय पुलिस और ग्रामीणों ने मिलकर यातायात बहाल किया — लेकिन पूरे घटनाक्रम में प्रशासन कहीं नहीं था।
पर्यावरणीय संकट: जलकुंभी बनी जानलेवा
सई नदी वर्षों से जलकुंभियों से पटी पड़ी है। स्थानीय लोगों का कहना है कि जलकुंभियों की परत इतनी मोटी है कि इंसान भी उस पर चल सकता है। यही परत अब जानलेवा साबित हो रही है।
“नदी की सफाई आख़िरी बार कब हुई, किसी को याद नहीं। हर साल यही हाल होता है,” — स्थानीय ग्रामीण रामअवध यादव
जलकुंभी केवल जल प्रवाह नहीं रोकती, यह ऑक्सीजन की कमी पैदा कर जलचर और पशुओं के लिए घातक हो जाती है।
आर्थिक नुकसान: पशुपालन की रीढ़ टूटी
कृपाशंकर यादव का नुकसान लगभग ₹10 लाख का है। एक अच्छी नस्ल की भैंस की कीमत ₹80,000 से ₹1 लाख तक होती है। 11 भैंसों का एक साथ डूब जाना, एक मध्यम किसान के लिए जीवन भर की कमाई गंवाने जैसा है।
यह केवल आर्थिक संकट नहीं, मानसिक आघात भी है। पशुपालन न केवल जीवनयापन का माध्यम है, बल्कि गांवों में सम्मान और सामाजिक पहचान का भी आधार है।
प्रशासन की ‘देर से आई प्रतिक्रिया’
शाम होते-होते जब सोशल मीडिया और लोकल पोर्टलों पर खबर तेज़ी से फैलने लगी, तब जाकर उपजिलाधिकारी, केराकत ने प्रतिक्रिया दी:
“घटना संज्ञान में है। भैंसों को निकालने और नुकसान का आकलन करने की कार्रवाई की जाएगी। मुआवजे की प्रक्रिया नियमानुसार पूरी की जाएगी।”
इसी प्रकार पशु चिकित्साधिकारी ने भी बयान दिया कि जलकुंभी और तेज बहाव के चलते ऐसी घटनाओं में बचाव कठिन होता है।
लेकिन सवाल यह है:
जब घटना को रोका जा सकता था, तब रोकने की कोई व्यवस्था क्यों नहीं थी?
तंत्र की त्रासदी: क्या केवल आश्वासन ही समाधान है?
यह घटना प्रशासन, नगर पंचायत, जल संसाधन विभाग और पशुपालन विभाग — सभी के लिए एक चेतावनी है। और अगर इससे भी कोई नहीं जागता, तो यह चुप्पी अगली त्रासदी को निमंत्रण है।
🔍 मूल समस्याएं:
- नदी की वर्षों से सफाई नहीं
- जलकुंभी नियंत्रण का कोई कार्यक्रम नहीं
- ग्रामीण संकटों में आपदा प्रबंधन की व्यवस्था नदारद
- पशुधन बीमा योजनाओं की ज़मीनी असफलता
✅ क्या होना चाहिए? (सुझाव और समाधान):
- नदी सफाई अभियान: जलकुंभी जैसी आक्रामक वनस्पतियों के लिए नियमित निगरानी और नियंत्रण।
- स्थानीय आपदा बचाव दल: ग्राम स्तर पर प्रशिक्षित ग्रामीण स्वयंसेवकों की टीम जो इस तरह के हादसों में तुरंत सहायता कर सके।
- पशुधन बीमा और मुआवज़ा: पारदर्शी, डिजिटल और समयबद्ध बीमा क्लेम प्रक्रिया।
- नदी प्रबंधन निगरानी समिति: पंचायत, प्रशासन और पर्यावरणविदों की संयुक्त कमेटी।
- जवाबदेही तय हो: किस अधिकारी ने सूचना मिलने के बाद भी कोई कार्रवाई नहीं की — इसकी जांच हो और ज़िम्मेदार पर कार्रवाई सुनिश्चित की जाए।
निष्कर्ष:
सई नदी में डूबी भैंसों की मौत एक समाचार मात्र नहीं — यह ग्रामीण भारत में आज भी सक्रिय ‘अनदेखी’, ‘अनुत्तरदायित्व’ और ‘लचर व्यवस्था’ का कड़वा आईना है। जलकुंभियों में फंसी सिर्फ 11 भैंसें नहीं थीं, बल्कि हमारे सिस्टम की संवेदना, कार्यक्षमता और तत्परता भी उसी गहराई में डूबती चली गई।
यह हादसा एक सवाल बनकर खड़ा है —
कब जागेगा प्रशासन? और क्या किसी किसान की जान-माल की कीमत एक प्रेस नोट से ज़्यादा है?
रिपोर्ट: मनोज कुमार सिंह
स्थान: जलालपुर, जौनपुर
Hind24tv वेब पोर्टल विशेष रिपोर्ट