जानीए धान की अधिक पैदावार के उपाय कैसे किया जाय इसकी सारी बिधिया

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जनीए भूमि की तैयारी किए 

जनीए गर्मी में उपयुक्त समय मिलने पर खेत की गहरी जुताई मिट्टी पलट हल से अवश्य कर लें। मेड़ों की सफाई अवश्य करें। गोबर या कम्पोस्ट की खाद 10 से 12 टन प्रति हेक्टर अंतिम जुताई या वर्षा पूर्व खेत में फैलाकर मिलायें।

धान की खेती की प्रचलित उपयोग 

 

 खेत में सीधे बीज बोजकर निम्न तरह से धान की खेती की जाती है-

छिटकवां बुवाई।

नाड़ी हल या दुफन या सीडड्रिल से कतारों में बुवाई।

बियासी पद्धति छिटकवां विधि से सवा गुना अधिक बीज बोकर बुवाई के एक महीने बाद फसल की पानी भरे खेत में हल्की जुताई।

लेही पद्धति धान के बीजों को अंकुरित करके मचौआ किये गये खेतों में सीधे

 छिटकवां विधि से बुवाई

 इस विधि द्वारा पहले धान की रोपणी (खार) सीमित क्षेत्र में तैयार की जाती है तथा 25 से 30 दिन के पौध को खेत को मचाकर रोपाई की जाती है।

बीज की मात्रा- 

धान के लिए बीज की मात्रा बुवाई के पद्धति के अनुसार अलग-अलग रखनी चाहिए, जो निम्नानुसार होनी चाहिए-

बोवाई पद्धति बीज दर                (किलो/हेक्टेयर)

छिटकवां विधि से बोना                  100-120

कतारों में बीज बोना                        90-100

लेही पद्धति में                                 70-80

रोपाई पद्धति में                              40-50

बियासी पद्धति                            10-20

बीज को थायरम या डायथेन एम 45 दवा 2.5 से 3 ग्राम प्रति किलो बीज के हिसाब से उपचारित करके बोनी करें। बैक्टेरियल बीमारियों के बचाव के लिये बीजों को 0.02 प्रतिशत स्ट्रेप्टोसाइक्लिन के घोल में डुबाकर उपचारित करना लाभप्रद होता है।

बुआई के समय-

अगर वर्षा प्रारंभ होते ही धान की बुआई का कार्य प्रारंभ कर दें। जून मध्य से जुलाई प्रथम सप्ताह तक बोनी का समय सबसे उपयुक्त होता है। रोपाई के बीजों की बुवाई रोपणी में जून के प्रथम सप्ताह से ही सिंचाई के उपलब्ध स्थानों पर कर दें क्योंकि जून के तीसरे सप्ताह से जुलाई मध्य तक की रोपाई से अच्छी पैदावार मिलती है।

खाद एवं उर्वरकों का उपयोग-

 

 धान की फसल में 5 से 10 टन/ हेक्टेयर तक अच्छी सड़ी गोबर खाद या कम्पोस्ट का उपयोग करने से महंगे उर्वरकों के उपयोग में बचत की जा सकती है। हर वर्ष इसकी पर्याप्त उपलब्धता न होने पर कम से कम एक वर्ष के अंतर से इसका उपयोग करना बहुत लाभप्रद होता है।

हरी खाद का बिधि 

रोपाई वाली धान में हरी खात के उपयोग में सरलता होती है, क्योंकि मचौआ करते समय इसे मिट्टी में आसानी से बिना अतिरिक्त व्यय के मिलाया जा सकता है। हरी खाद के लिए सनई का लगभग 25 किलोग्राम बीज प्रति हेक्टेयर के हिसाब से रोपाई के एक महीना पहले बोना चाहिए। लगभग एक महीने की खड़ी सनई की फसल को खेत में मचौआ करते समय मिला देना चाहिए। यह 3-4 दिनों में सड़ जाती है। ऐसा करने से लगभग 50-60 किलो ग्राम प्रति हेक्टेयर उर्वरकों की बचत होगी।

जैव उर्वरकों का बिधि 

कतारों की बोनी वाली धान में 400 ग्राम प्रति हेक्टेयर प्रत्येक एजेटोवेक्टर और पीएसबी जीवाणु उर्वरक का उपयोग करने से लगभग 15 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर नत्रजन और स्फुर उर्वरक बचाए जा सकते हैं। इन दोनों जीवाणु उर्वरकों को 50 किलो ग्राम/ हेक्टेयर सूखी सड़ी हुई गोबर खाद में मिलाकर बुवाई करते समय कूड़ों में डालने से इनका उचित लाभ मिलता है। सीधी बुवाई वाली धान में उगने के 20 दिनों तथा रोपाई के 20 दिनों की अवस्था में 15 किलो ग्राम/ हेक्टेयर हरी नीली काई का भुरकाव करने से लगभग 20 किलोग्राम/ हेक्टेयर नत्रजन उर्वरक की बचत की जा सकती है। ध्यान रहे काई का भुरकाव करते समय खेत में पर्याप्त नमी या हल्की नमी की सतह रहनी चाहिए।

उर्वरकों का उपयोग कैसे करे 

धान की फसल में उर्वरकों का उपयोग बोई जाने वाली प्रजाति के अनुसार करना चाहिए जो निम्नतालिका में दर्शाया गया है। उपरोक्त मात्रा प्रयोगों के परिणाम पर आधारित है, किन्तु भूमि परीक्षण द्वारा उर्वरकों की मात्रा का निर्धारण वांछित उत्पादन के लिए किया जाना लाभप्रद होगा।

उर्वरक देने का समय 

नत्रजन की आधी मात्रा तथा स्फुर व पोटाश की पूरी मात्रा आधार खाद के रूप में बोनी/रोपाई के पूर्व खेत तैयार करते समय अथवा कीचड़ मचाते समय भुरककर मिट्टी में मिलायें शेष नत्रजन की 1/4 मात्रा कंसे फूटने की अवस्था में रोपाई के 20 दिन तथा 1/4 मात्रा गभोट की अवस्था में देना चाहिए। जस्ते की कमी वाले क्षेत्रों में खेत की तैयारी करते समय जिंक सल्फेट 25 किलो/ हेक्टेयर की दर से 3 साल में एक बार प्रयोग करें। गंधक की कमी वाले क्षेत्रों में गंधक युक्त उर्वरकों (जैसे सिंगल सुपर फास्फेट आदि) का प्रयोग करें।

जल प्रबंध

धान की फसल में जल प्रबंध का विशेष महत्व है। अधिक कंसे प्राप्त करने हेतु नत्रजन की अधिक उपयोगिता एवं नींदा कम करने हेतु उचित जल प्रबंध आवश्यक है। रोपाई से कंसे निकलने की अवस्था तक खेत में पानी की सतह 2-5 से.मी. रखना चाहिए। कंसे निकलने के बाद से गंभोट की अवस्था तक 10-15 सेमी पानी की सतह रखें। धान की फसल में आवश्यकता से अधिक पानी भरना अच्छी पैदावार प्राप्त करने में बाधक है।

पकने की अवधि                             
                                                              
शीघ्र पकने वाली (80 से 100 दिन)   
मध्यम समय में पकने वाली             
(100 से 125 दिन)
मध्यम/देरी से पकने वाली               
(130 से 145 दिन)
संकर किस्में हायब्रिड                  
लेही के लिए बीज अंकुरित करना-

लेही पद्धति से बोनी करने के लिए खेत की तैयारी के तुरन्त बाद अंकुरित बीज उपलब्ध होना चाहिए। अत: लेही बोनी के लिए प्रस्तावित समय के 3-4 दिन पहले से ही बीज अंकुरित करने का कार्य शुरू कर दें। इस हेतु निर्धारित बीज की मात्रा को रात्रि में पानी में 8-10 घंटे भिगोयें, फिर इन भीगे हुए बीजों का पानी निकालकर पानी निथार दें। तदुपरांत इन बीजों को पक्की सूखी सतह पर बोनों से ठीक से ढंक दें। ढकने के 24-30 घण्टे के अंदर बीज अंकुरित हो जाता है। इसके बाद डंके गये बोरों को हटाकर बीज को छाया में फैलाकर सुखायें। इन अंकुरित बीजों का इस्तेमाल 6-7 दिनों तक किया जा सकता है

रोपणी में पौधे तैयार करना-

 जितने रकबे में धान की रोपाई करना हो उसके 1/20 भाग में रोपणी बनाना चाहिए। इस रोपणी में निर्धारित क्षेत्र के लिए आवश्यक बीज इस प्रकार से बोनी करना चाहिए कि लगभग 3-4 सप्ताह के पौध रोपाई के लिए समय पर तैयार हो जाये। रोपणी के लिए 2-3 बार जुताई, बखरनी करके अच्छी तरह पहले खेत तैयार करें। इसके बाद खेत में 1.5-2.0 मीटर चौड़ी पत्तियां बना लें तथा इनकी लम्बाई खेत अनुसार कम अधिक हो सकती है। प्रत्येक पट्टी के बीच 30 से.मी. की नाली रखें। इन नालियों की मिट्टी नाली बनाते समय पट्टियों में डालने से पट्टियां ऊंची हो जाती हैं। ये नालियां जरूरत के अनुसार सिंचाई व जल निकास के लिए सहायक होती है। रोपणी में बीजों की बुवाई 8 से 10 से.मी. के अंतर से कतारों में करने से रखरखाव तथा रोपणी हेतु पौध उखाडऩे में आसानी होती है।

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