जौनपुर:शहीद और हौज गांव: आखिर क्या है रिस्ता, जाने पूरा सच,हौज गांव के 16 युवको को आजादी की लड़ाई में अंग्रेजी हुकूमत ने दी थी फांसी

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Hind24Tv:शहीद और हौज गांव: आखिर क्या है रिस्ता, जाने पूरा सच,हौज गांव के 16 युवको को आजादी की लड़ाई में अंग्रेजी हुकूमत ने दी थी फांसी

जौनपुर:सिरकोनी विकास खण्ड का हौज गांव आजादी की लड़ाई में अपने 16 जांबाज युवको के प्राणों को देकर इतिहास में दर्ज है।यह वही गांव है जिसके सार्वधिक युवक आजादी की लड़ाई में शहीद हुए थे।

आजादी की मांग को लेकर शहीद हुए 16 वीर सपूतों का हौज गांव से आखिर क्या रिश्ता है। किस बात को लेकर अंग्रेजों ने इन वीरों को महुए के पेड़ से लटकाकर फांसी दे दी। तो आइये उन 16 रणबाकुरों की जीवन गाथा को जानने के लिये चलते है हौज गांव।

जिला मुख्यालय से आठ किमी. वाराणसी राज्य मार्ग से सटे हुए इस गांव से जैसे ही आप गुजरेंगें तो आपको एक शहीद द्वार मिल जायेगा। मन में सहसा यह प्रश्न उठता है कि आखिर इस गांव का शहीदों के क्या संबन्ध है।

मन में अगर जानने की इच्छा हो तो द्वार से मात्र एक किमी. अन्दर जाने पर आपको शहीदों की यादों को समेटे वह स्तम्भ दिखाई देगा। जिस पर उन 16 रणबाकुरों के नाम स्वर्णिम अक्षरों में अंकित है जिन्होने देश को आजादी दिलाने के लिये 1857 में हंसते-हंसते अपने प्राणों की आहुति दे दिया था।

बताते चलें की 1857 में देश अंग्रेजों की गुलामी के बेड़ी में बधा हुआ था। आजादी के लिए देश जूझ रहा था। ऐसे में भारत को आजाद कराने के लिए हौज गांव के सपूतों ने बीड़ा उठाया।

5 जून सन 1857 को हौज गांव के सपूतों को पता चला कि अंग्रेज अधिकारी विगवूड अंग्रेजी सेना टुकड़ी के साथ गुजरने वाला है। इन सपूतों ने देश को आजाद कराने के लिए अंग्रेजी सेना की टुकड़ी पर हमला करने की योजना बना लिया। दोपहर का समय था। वर्तमान में सिरकोनी ब्लॉक के पास स्थित चौमना गांव के पास उस समय सुनसान रास्ता था।

हौज गांव के सपूत लाठी, डंडा, भाला, गड़सी आदि स्वदेसी हथियारों से लैस उक्त स्थान पर अंग्रेजी सेना के इंतजार में थे,जैसे ही दोपहर के वक्त करीब तीन बजे 25 की संख्या में अंग्रेजी सेना उक्त स्थान पर पहुच, हौज गांव के रणबांकुरों ने हमला बोल दिया। कुछ ही देर में अंग्रेजी सेना के 25 लोगों को इन सपूतों ने मौत के घाट उतार दिया।

अंग्रेज अधिकारी विगवुड को उसके ही लाइसेंसी बंदूक से गोली मारकर हत्या कर दिए। इसके बाद मारे गए अंग्रेजी सेना के 25 लोगों के लाश को हौज गांव के स्वतंत्रता संग्राम सेनानियों ने राजेपुर “टड़िया” गांव में स्थित एक भीटा रूपी जमीन में खन कर गाड़ दिया।

अंग्रेजी सेना के मारे जाने तथा लाश गायब होने की जानकारी जब अंग्रेजों को हुई तो वह बौखला गए और 6 जून को हौज गांव में 16 सेनानियों को गिरफ्तार कर लिया। और उसके बाद सन 1858 को गांव के ही एक महुए के पेड़ पर 15 वीर सपूतों को फांसी पर लटका दिए तथा एक सपूत को कालापानी की सजा दी गई।

……और नहीं मिल पाई थी अंग्रेजी सेना की लाश।

हौज गांव के सेनानियों ने 5 जून सन 1857 को अंग्रेजी हुकूमत के 25 सेना की हत्या के बाद लाश को चार किलोमीटर दूर राजेपुर “टढ़िया” गांव में स्थित एक सुनसान टिला,भीटे रूपी जमीन काफी गहरा गड्ढा खोदकर दफन कर दिया था।

अंग्रेजी हुकूमत को 25 सेना व अधिकारी विगवुड के मारे जाने की सूचना जब लगी तो हौज गांव के सेनानियों को गिरफ्तार करने के लिए 6 जून 1857 को गांव को सैकड़ो की संख्या में घेर लिए और 16 रणबांकुरों को गिरफ्तार कर लिये। उसके बाद लाख कोशिश के बाद भी अंग्रेजी हुकूमत लाश को बरामद नहीं कर पाए थे।

केवल एक लाश अंग्रेज अधिकारी बिगवुड कि बरामद कर पाए थे वो भी हौज गांव के सपूतों ने जानबूझकर उसके लाश को घटनास्थल पर छोड़ दिया था जिससे अंग्रेजी हुकूमत में पैगाम जा सके।

गांव के वीर सपूतों ने उनके शेष लाश के ठिकाने का पता नहीं बताया और अंत में अंग्रेजी हुकूमत के लोगो ने 16 सपूतो को गांव के महुए के पेड़ पर फांसी दे दिए। उक्त पेड़ अब मौके पर नही है,।

गांव के बुजुर्ग तथा वीर सपूतों के वंसज चिंताहरण सिंह ने बताया कि 15 वर्ष पूर्व सन 2003 में उक्त भीटे की खुदाई भट्ठा मालिकों द्वारा किया जा रहा था।

उस दौरान अंग्रेजी हुकूमत के सेनाओं की तमाम अस्थियां भारी मात्रा में निकली हुई। उक्त अस्थिया हौज गांव के सपूतों के कारनामे और अंग्रेजी सेना के दफनाए जाने की प्रमाण थी।

गांव के बुजुर्गों ने बताया कि हम लोगो को बचपन मे पिता व गांव के बुजुर्ग राजेपुर गांव में अंग्रेजी सेना को दफनाए जाने की कहानियां सुनाया करते थे। सन 2003 में उक्त अस्थियो को देखने के बाद कहानी के सत्य होने का एहसास हुआ।

1858 में इस गांव के 16 सेनानियों को फांसी व एक को काला पानी की सजा सुनाई गई थी,जिनके नाम, फांसी दिए जाने की तारीख इस प्रकार हैं।

7 जून 1858 को
1-इंदरमन पुत्र धनु।
2- शिवदीन पुत्र चतुरी।
3- ब्रह्मपुत्र बाल दत्त।
8 जून सन 1858 को
4-बाबर पुत्र सीता
5-सुक्खू पुत्र पवरू।
6- गोवर्धन पुत्र बाल दत्त।
5 सितंबर सन 1858 को
7-सुखी पुत्र इंदरमन,
8-परसन पुत्र बदलू,
9-मान वल्द धानु,
10-रामेश्वर वल्द दीना,
11- रामदीन पुत्र लोचन,
12-सुखलाल पुत्र नारायण
13- मातादीन पुत्र बरियार,
14-शिवपाल पुत्र बरियार,
15- ब्रह्मपुत्र बाल दत्त।
तथा 13 फरवरी सन 1860 को बाल दत्त पुत्र जसन को काले पानी की सजा दी गई थी।

अतीत की यादो को समेटे हुआ है गांव का कुआं।

5 जून सन 1857 को 25 अंग्रेज सेनाओं की हत्या के बाद उनके लाशों को ठिकाने लगाकर हौज के वीर सपूत गांव में ही थे। उधर 25 अंग्रेजी सिपाहियों के हत्या व लाश गायब होने की जानकारी होने पर अंग्रेजों में हलचल मच गया था। और वह हौज के स्वतंत्रता संग्राम सेनानियों के गिरफ्तार करने के लिए 6 जून सन 1857,को सैकड़ों की संख्या में गांव को घेर लिया।

इस बात की जानकारी होने पर अंग्रेजों की हत्या में प्रयोग किए गए हथियार को गांव के सेनानियों ने गांव में ही स्थित कुए के अंदर डालकर छिपा दिया था।

गांव के बुजुर्गों ने बताया कि उक्त कुआं हमारे अतीत की यादों को समेटे हुआ है। आज भी अगर कुएं को उगारा जाए तो उस समय के फेंके गए हथियारों का कुछ ना कुछ अंश जरूर मिल सकता है।

उक्त गांव के लोग शासन-प्रशासन से अपेक्षा किए हुए हैं कि अतीत की यादों को याद दिलाने वाले कुएं का जीर्णोद्धार तथा नवीनीकरण कराया जाए। जिससे हमें हमारे अतीत की यादों को याद दिलाने वाला यह कुआं पीढ़ी दर पीढ़ी चलता रहे।

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